विष्णु खरे : हिन्दी सिनेमा का पहला ‘रेआलपोलिटीक’-वर्ष

Posted by arun dev on जनवरी 31, 2016








विष्णु खरे का हिंदी और विश्व फिल्मों से नाता 5 दशकों से भी अधिक पुराना है. वह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में लिखते रहे हैं. उनका मानना है कि हिंदी सिनेमा का 2015 का वर्ष सबसे जुदा है. 
उन्हीं के शब्दों में  हिन्दी सिनेमा का पहला रेआलपोलिटीक साल. इसी बहाने हिंदी सिनेमा और राजनीति के आपसी रिश्तों पर भी प्रकाश डाला गया है. उनके निष्कर्षों से  शायद आप सहमत हों? यह आलेख आपके लिए.  

हिन्दी सिनेमा का पहला ‘रेआलपोलिटीक’-वर्ष                                      

विष्णु खरे 


फिल्म-निर्माण मूलतः मनोरंजन-उद्योग है और उसका ध्येय निर्माता को सारे ख़र्चे निकालकर इतना  मुनाफ़ा कमाकर देना है कि उसकी दिलचस्पी और हैसियत अगली फिल्में बनाने में भी बनी रहे – वह किसी भी तरह की कहानी पर बनी फिल्म के ज़रिये क्यों न हो. कोई पिक्चर ‘पौराणिक’ ,‘धार्मिक’,  ’मुस्लिम’, ’सामाजिक’, ’फ़ंतासी’, ’क्राइम’ या ‘माफ़ियाई’, ’कलावादी’, ’नाच-गाने-स्टंट’ वाली हो, इतनी राजनीतिक हो कि उस पर ‘नक्सलवादी’ होने तक का आरोप लग जाए, या कथित समझदार दर्शकों के क़तई देखने लायक़ न हो, जब तक वह अधिकांशतः सामान्य दर्शकों को बाँधे रख कर उनका मनोरंजन करती हो और निर्माता के लिए टिकट-खिड़की पर ‘हिट’ हो,तब तक उसके निर्माता-निर्देशक को उसकी ’असली’,व्यावहारिक’ सियासत या ‘रेआलपोलिटीक’ से कोई वास्ता नहीं रहता.’आवारा’ और ‘श्री 420’ राज कपूर के लिए सुपरहिट फ़िल्में थीं, कहानीकार ख़्वाज़ा अहमद अब्बास के लिए भले ही उनमें वामपंथी या प्रगतिशील सन्देश रहे हों.

उद्योगपति को सट्टे-बाज़ार की तरह सिर्फ़ रोज़मर्रा की राजनीति, भले ही उसे ‘पार्टी-पॉलिटिक्स’ कह लें, जाननी होती है लेकिन वह न राजनीतिक बुद्धिजीवी होता है न होना चाहता है. लेकिन सिनेमा समाज और मुल्क से इतना वाबस्ता होता है कि दोनों परस्पर असर डाले बिना रह नहीं सकते. निर्माता, निदेशक,कहानी-और-संवाद-लेखक,और लगभग सभी एक्टर फ़िल्म के उन सभी पहलुओं के लिए सही या ग़लत ज़िम्मेदार माने जाते हैं जो दर्शकों को  किसी भी तरह से प्रभावित करते हैं. उनमें राजनीति हो या न हो,देखी जाने लगती है.

फिल्मों में राजनीति का चित्रण, फिल्म-जगत के बाशिंदों के बीच की व्यक्तिगत या गुटीय राजनीतियाँ और सिने-संसार में वास्तविक राष्ट्रीय राजनीति का प्रवेश यह तीनों अलग-अलग घटनाएँ कही जा सकती हैं.आज़ादी के पहले हिंदी फ़िल्मों में राजनीतिक चेतना नहीं थी यह तो नहीं कहा जा सकता किन्तु ब्रिटिश सेंसर और कठोर क़ानूनों के चलते वह ‘’भाषिक’’ और प्रतीकात्मक ज़्यादा थी. उनमें  किसी भी तत्कालीन देशी-विदेशी राष्ट्रवादी या क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी या नेता का सीधा और यथार्थ चित्रण या ज़िक्र असंभव था.अधिकतर फ़िल्में और उनसे जुड़े हुए लगभग सभी लोग राजनीति से दूर ही रहे.

आज़ादी के बाद 1964 तक राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में (जवाहरलाल) नेहरू का युग रहा जिसके ज्यादा ब्यौरों में न जाते हुए उसे महाभारत की शैली में ‘शांतिपर्व’,‘उद्योगपर्व’ या ‘निर्माणपर्व’ कहा जा सकता है.जितनी दिलचस्पी नेहरू को सिनेमा में नहीं रही होगी उससे कहीं अधिक सिनेमावालों को नेहरू में थी. 1953 के बाद जन्मे हुए भारतीय नेहरू के ऐन्द्रजालिक व्यक्तित्व और सम्मोहन की कल्पना कर ही नहीं सकते. पूरा देश ही नेहरू का फ़ैनैटिक फ़ैन था, पृथ्वीराज कपूर, अशोक कुमार, मोतीलाल, दिलीप-देव-राज की महान त्रिमूर्ति, बलराज साहनी तथा अन्य वामपंथी फिल्म व्यक्तित्व, लेखक-गीतकार, सभी प्रबुद्ध निर्माता-निदेशक, सारी नायिकाएँ सिर्फ़ नेहरू के साथ एक सैल्फ़ी खिंचाने के लिए तीन मूर्ति भवन के चक्कर काटते थे. इनमें से कुछ कॉन्ग्रेस के नज़दीक रहे होंगे, लेकिन नेहरू ने उन्हें बहुत ज़्यादा महत्व कभी नहीं दिया. महत्व दिया उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने, विशेषतः नर्गिस-सुनील दत्त-दम्पति को अपने नज़दीक़ रख कर. आज सुपुत्र संजय दत्त देशद्रोह से मिलते-जुलते जुर्म में पैरोल की मधुर प्रतीक्षा कर रहे हैं. फिर बीच में एक एपिसोड अमिताभ बच्चन को लेकर भी आया जो सांसद भी बने,इंदिराजी की काँग्रेस सरकार की तीमारदारी में मृत्यु से बचे लेकिन बाद में रेआलपोलिटीक को ‘नाबदान’ कहकर अस्थायी रूप से उससे बाहर आ गए.अब वह ब्रांड एम्बेसडर सरीखी नीम-सियासी बकवास भूमिकाओं में करोड़ों रुपए और सर्वोच्च सत्तारूढ़ राजनीति से अंतरंगता और क्लाउट कमा रहे हैं.

फिल्म-जगत को लेकर बाद के अधिकांश प्रधानमन्त्री मनहूसियत की हद तक अज्ञानी और उदासीन रहे लेकिन सोनिया-राहुल-मनमोहन सरकार की दूसरी इनिंग्स के दौरान बहुत सारे ग़ैर-राजनीतिक तत्व अचानक राजनीति में सक्रिय हुए जिनमें फ़िल्मी दुनिया के लोग भी थे. इसकी दागबेल कुछ भाजपा और कुछ अमर-मुलायम सिंहद्वयों ने डाली थी.  जयप्रदा, जया बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना  आदि जैसे नाम राजनीति में सुनाई देने लगे.भारतीय रेआलपोलिटीक में यह नई शुरूआत थी. यों जब से मुंबई में शिव सेना अस्तित्व में आई है, सारी  फ़िल्मी दुनिया उसके नेताओं के यहाँ भयभीत हाज़िरी बजाती रही है. यह दिलचस्प है कि स्वयं को सेक्युलर दिखानेवाले फ़िल्मी लोगों ने खुल्लमखुल्ला काँग्रेस-विरोधी दलों, विशेषतः साम्प्रदायिक भाजपा में,जाना अंगीकार किया और जिनकी सहानुभूति काँग्रेस से थी वह एक अर्द्ध-प्रगतिशील,धर्मनिरपेक्ष, प्रबुद्ध, आधुनिक चेहरा लगाए हुए बाहर ही एक ‘अराजनीतिक’ रुख अपनाए रहे.

हिंदी सिने-जगत और राष्ट्रीय राजनीति,विशेषतः भाजपा, के बीच विकसित होते हुए संबंधों को लेकर रिसर्च की जानी चाहिए. 2014 के आते-आते जब सुनिश्चित हो गया कि भाजपा प्रचंड बहुमत से केंद्र में सत्तारूढ़ होने जा रही है तो फ़िल्म-जगत के भाजपा-समर्थकों का राजनीतिक साहस और बढ़ गया और वह निस्संकोच नरेंद्र मोदी के प्रशंसकों में दीखने लगे.परेश रावल ने भावी प्रधानमंत्री पर एक जीवनचित्र बनाने की घोषणा कर दी. अनुपम खेर सपत्नीक भाजपा के साथ थे, एक शत्रुघ्न को छोड़ कर कई नए-पुराने फ़िल्मवाले लामबंद होकर पार्टी के काम में लग गए. ऐसी असरदार कतार काँग्रेस के पास न पहले थी, न 2014 में दिखाई दी. महाराष्ट्र काँग्रेस भी कोई सिनेमाई-समर्थन नहीं जुटा पाई.  महेश भट्ट,गुलज़ार,शबाना और जावेद सरीखे भी मौक़ाशनास फ़ैन्स-सिटर बने तमाशा देखते रहे.

लेकिन दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी सरीखे लेखक-बुद्धिजीवियों-सक्रियतावादियों  की हत्याओं के बाद, जिनकी जाँच अभी तक कहीं नहीं पहुँची है, जब हिंदी के कुछ लेखकों द्वारा अपने सम्मान लौटाए गए और वह क़दम असहिष्णुता-विरोधी आन्दोलन बन कर साहित्य की सीमाएँ लाँघ गया तो उसे एक अप्रत्याशित समर्थन आमिर खान और शाहरुख़ खान से मिला. यदि यह दोनों सामान्य फ़िल्मी सितारे होते तो शायद इनके इन्टॉलेरेंस-विरोधी वक्तव्यों को उतना महत्व न मिलता, लेकिन वह बॉक्स-ऑफिस पर सफलतम अभिनेता और फिल्म-निर्माता हैं, टीवी व्यक्तित्व हैं, और, अल्लाह-लगती बात तो यह है,  दोनों मुस्लिम हैं. इनके बयानों पर भाजपा-समर्थकों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर अशोभनीय विवाद होना ही था लेकिन उनसे फिल्म-जगत में भी पहली बार राजनीतिक और साम्प्रदायिक विभाजन हुआ. कई धूर्त और पाखंडी मेक-अप गैट-अप उतर गए. नक़ली एकता और भाईचारा ढह गए. अभी जयपुर साहित्य समारोह में करण जौहर ने भी हिन्दुत्ववादियों पर एक हमला कर दिया. अभी यह घटनाक्रम रुका नहीं है.

2015 को क्या हम फ़िल्म-उद्योग के लिए लैटिन का Annus Horribilis (भयानक वर्ष) कह सकते हैं ? पुणे का फ़िल्म इंस्टीट्यूट सिनेमा से ही गर्भनालवत् जुड़ा हुआ है. वहाँ व्यापक विरोध के बावजूद अंततः एक उसी नामाक़ूल शख्स को बैठा दिया गया है. सेन्सर बोर्ड में हो रही जूतम-पैजार को हम देख ही रहे हैं, जहाँ पहलाज निहलानी सरीखा मीडिऑकर फिल्मकार संस्कारी सेंसरशिप की अल्लम-ग़ल्लम बातें कर रहा है. लेकिन यह भी है कि फिल्म-इंडस्ट्री के आधुनिक कहे जाने वाले लोग ‘बकचोद’ को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न बना लेते हैं. उधर सनी लेओने (दीदी/आन्टी, जो भी आप कहना चाहें,) को हिंदी सिनेमा के रेआलपोलिटीक में एक बहुत बड़ी स्टार मान लिया गया है और अब उनकी शान में कोई भी सवाली गुस्ताखी अजीबोग़रीब व्यक्तित्वों द्वारा एक कलात्मक कुफ़्र बना दी गई है, जबकि आज भी महज़ साठ अमरीकी डॉलर में आप वर्ष-भर उन्हें विवस्त्र किसी के भी साथ कुछ भी करते देख सकते हैं.

मैं क़रीब 1950 से बाबूराव पटेल की ‘मदर इंडिया’, टाइम्स ग्रुप की ‘फिल्मफेयर’ और एक्सप्रेस ग्रुप के ‘स्क्रीन’ से शुरू कर न जाने कितनी अंग्रेजी-हिंदी फ़िल्मी पत्रिकाएँ और किताबें देखता रहा हूँ. कुछ हज़ार फ़िल्में तो देखी होंगी. मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से भी पचासेक बरस से वाक़िफ़ हूँगा. फिल्मों पर हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों में लिखा है.  

कुछ अधिकार से कह सकता हूँ कि हिंदी फिल्मों का 2015 जैसा वर्ष मैंने नहीं देखा. इसे हम मुंबई सिनेमा का Coming of Age (बालिग़ी बरस) कहें या Comeuppance (वाजिब भुगतमान) का ? क्या यह वाक़ई एक असली ‘कट-ऑफ़ डेट’ है?
(विष्णु खरे का कॉलम. नवभारत टाइम्स मुंबई में आज प्रकाशित, संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ.अविकल. फोटो ग्राफ गूगल से साभार)
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विष्णु खरे 
(9 फरवरी, 1940.छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश)
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