परिप्रेक्ष्य : अवधनारायण मुद्गल : हरे प्रकाश उपाध्याय

Posted by arun dev on फ़रवरी 28, 2017


















‘सारिका’ पत्रिका के संपादक रहे अवधनारायण मुद्गल अपनी कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं.

उनकी जन्मतिथि २८ फरवरी को पड़ती है. इस अवसर पर हरे प्रकाश उपाध्याय का यह लेख उन्हें आत्मीयता से याद करते हुए.




 अवधनारायण मुद्गल :  एक संपादक का अकेलापन                                                    

हरे प्रकाश उपाध्याय




वधनारायण मुदगल की पहचान मोटे तौर पर एक संपादक और कहानीकार की है, पर उन्होंने लिखा लगभग सभी विधाओं में है. अमूमन हर रचनाकार की शुरुआत कविताओं से ही होती है, मुद्गल जी ने भी कविताओं से ही शुरुआत की और शीघ्र ही वे कहानी की ओर मुड़ गये मगर कविता कर्म उनका बाद में भी उसी गंभीरता से जारी रहा. कविताओं से प्रेम करना उन्होंने आजीवन छोड़ा नहीं. मुद्गल जी ने लिखा है-


मेरी स्पष्ट धारणा है कि कविता को नकारना 90 प्रतिशत साहित्य को और विशेष रूप से क्लासिकी साहित्य को नकार देना है.
हम थोड़ी देर के लिए विश्व साहित्य को भूल जाएं और सिर्फ हिंदी साहित्य की ही बात सोचें, तो परिणाम और भी ज्यादा तकलीफदेह हो सकते हैं.
कविता की अस्वीकृति से अपने (हिंदी के) साहित्य के प्रति गर्व का आधार ही समाप्त हो जाएगा. (अवधनारायण मुद्गल समग्र-1/ पृ. 25).

जाहिर है वे कविता को बहुत ज्यादा प्यार करते थे. छंदबद्ध और छंदमुक्त दोनों तरह की कविताएं उन्होंने लिखी. ग़ज़लें भी लिखीं. मुद्गल जी ने भारतीय मिथकों और ऐतिहासिक चरित्रों को भी अपनी कविता में अपनी तरह से परखने-विश्लेषित करने की कोशिश की. उनकी कविताओं और कहानियों में एक व्यंग्यात्मक भंगिमा भी लगातार दिखाई देती है. इसके अलावा मुद्गल जी का रचना संसार लघुकथाओं, व्यंग्यों, निबंधों तक फैला हुआ है. उन्होंने निरंतर स्तंभ लेखन भी किया. इसके अलावा अनुवाद का भी बहुत महत्वपूर्ण काम किया. वे रसियन साहित्य और भारतीय दर्शन के मर्मज्ञ थे. साहित्यिक पत्रकारिता उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान लखनऊ आने के बाद जो शुरू की, तो अंत-अंत तक वह उनके साथ लगी रही.

सारिका जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका में उन्होंने बतौर उपसंपादक अपना सफर शुरू कर संपादक तक की यात्रा पूरी की और लगभग एक दशक तक उसके संपादक बने रहे. इस दौरान अपनी अद्भुत संपादकीय दृष्टि व क्षमता का परिचय उन्होंने दिया. जबकि बतौर संपादक सारिका का दायित्व जब उन्होंने संभाला था, तो पत्रिका अत्यंत प्रतिकूल स्थितियों और ढेर सारी चुनौतियों से जूझ रही थी. मगर अपनी सूझ-बूझ से उन्होंने न सिर्फ उसे एक जीवन दिया बल्कि उसके माध्यम से बहुत सारे नये लेखकों और नये विषयों को सामने लाने में भी वे सफल रहे. अभी मुद्गल जी की पत्रकारीय-रचनात्मक क्षमता का मूल्यांकन हुआ नहीं है पर जब होगा तो उनके काम के अनेक सार्थक पहलू चमक उठेंगे. मुद्गल जी एक महत्वाकांक्षी लेखक कभी नहीं रहे. वे पूरी विनम्रता और ईमानदारी से अपना काम करते रहे, जो वे कर सकते थे. उन्होंने अपने किये का नगाड़ा कभी नहीं पीटा, न किसी प्रलोभन के पीछे बहुत तत्पर-सक्रिय हुए. वे आगरा के एक गाँव से आये थे, जहाँ उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई, फिर लखनऊ होते हुए मुंबई-दिल्ली जैसे महानगरों में पहुँचे मगर उनके कस्बाई मन व संस्कार नहीं बदले. वे उसी तरह जीवनपर्यंत सहज-सरल बने रहे. उन्होंने अपनी रचनात्मक क्षमता का होम दूसरी साहित्यिक प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए कर दिया.

नये लेखकों के रचनात्मक निखार के बारे में वे हमेशा चिंतित व सत्तर्क रहे. उन्होंने नये लेखकों के लिए आशा, आत्मविश्वास और लेखन के प्रति आस्था को जरूरी शर्त के तौर पर रेखांकित किया है. आज लघुकथा विधा के कई झंडे और साम्राज्य बन गये हैं पर शुरुआती दौर में लघुकथा पर व्यवस्थित आलोचना का श्रेय मुद्गल जी को ही जाता है. मुद्गल जी हमेशा अपने समय की चुनौतियों से टकराते रहे. उन्होंने अपने लेखों में तत्कालीन समाज, राजनीति और संस्कृति के प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया है. उनके लिए लेखन एक फैशन या करियर भर नहीं था, वे लिखित शब्दों की गरिमा के प्रति गंभीर लेखक थे. लिखित शब्दों के घटते असर को लेकर उनकी चिंता उनके संपादकीय लेख में भी उजागर होती है. वे लिखते हैं-
लिखित शब्द के प्रति आस्था की स्थिति हमारे यहाँ अधिक चिंताजनक है.
इसके कारण हैं- शब्द के द्वारा फैलाये हुए भ्रम.
एक ओर शब्द को ब्रह्म कहकर उसे अगम्य और दुरुह बना दिया गया है, अर्थात् उसे लोक जीवन से काटकर अलौकिकता की अदृश्य अलमारियों में बंद करने की कोशिश की गयी है, दूसरी ओर पुस्तकस्थातु या विद्या के रूप में अव्यावहारिक घोषित कर दिया गया है और तीसरी ओर मायावादियों ने नहि नहि रक्षति डुंकिंकरणे के रूप में मृत्यु के सामने उसे कमजोर और वाहियात साबित करने की कोशिश की है.
इसी तरह ही शब्द के खिलाफ और भी बहुत सी स्थितियाँ खड़ी की गयी हैं, जो एक दूसरे की विरोधी होकर भ्रमों को जन्म देती हैं और आदमी को उसकी अपनी ही जिंदगी से काटकर अलग कर देती हैं. फिर भला लिखित शब्द के प्रति आस्था कहाँ टिकेगी?”
(अवधनारायण मुद्गल समग्र-2/पृ. 28)

मुद्गल जी का जन्म एक बहुत ही साधारण आर्थिक हैसियत वाले परंपरावादी किस्म के परिवार में 28 फरवरी 1936 को आगरा जिले की बाह तहसील के ऐमनपुर गाँव में हुआ. जहाँ प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे कानपुर आ गये और बलदेव सहाय संस्कृत महाविद्यालय से उन्होंने संस्कृत साहित्य में शास्त्री किया. पारिवारिक दबाव के कारण वे संस्कृत पढ़ भले रहे थे, पर उऩका मन उसमें रमता नहीं था. साहित्य की ओर उनका रुझान बन चुका था और अपने समय के प्रमुख हिंदी लेखकों से उनका संवाद कायम हो गया था, खासकर अमृतलाल नागर और यशपाल वगैरह से.

अमृतालाल नागर के बेटे से उनकी दोस्ती थी और नागर जी के ही बुलावे पर वे बीए करने लखनऊ आये और लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्होंने नाम लिखाया. मानव शास्त्र से उन्होंने एमए किया. फिर पत्रकारिता का चस्का लगा. जनयुग, स्वतंत्र भारत से जुड़े. फिर हिंदी समिति, लखनऊ में काम करने के बाद सारिका में काम करने मुंबई चले गये. सत्ताइस साल सारिका को उन्होंने अपनी सेवाएं दी. एक साहित्यिक पत्रकार के तौर पर नये लेखकों से उन्होंने बहुत आत्मीय रिश्ता बनाया और उन्हें मंच देने के लिए बढ़-चढ़कर कोशिश की. हालांकि इन सबमें उनका अपना लेखन काफी प्रभावित हुआ.

उनके खाते में कविताओं के अलावा दो कहानी संग्रह, एक सफरनामा और अनेक संपादित पुस्तकें दर्ज हैं.मेरी कथा-यात्रा’, ‘कबंध (कहानीसंग्रह), ‘मुंबई की डायरी’, ‘एक फर्लांग का सफरनामा (यात्रावृत्तांत) उनकी चर्चित कृतियाँ हैं. पीर बावर्ची भिश्ती खर, टूटी हुई बैसाखियाँ, गंधों के साये, रिटायर अफसर, शताब्दियों के बीच, संपाती, कबंध, चक्रवात, एक एहसास शताब्दियों पहले का, अँधेर से अँधेरे तक, अंत के बीच उभरती शक्लें, राजनीति की शवयात्रा, परिवर्तनवादियों के बीच, अँधे सूरज का अनुशासन, जून की एक शाम आदि उनकी चर्चित कहानियाँ हैं.

महेश दर्पण के संपादन में किताब घर प्रकाशन दिल्ली से दो खंडों में अवधनारायण मुद्गल समग्र प्रकाशित हुआ है-2008 में, जिसके पहले भाग में कहानियां, लघुकथाएं, कविताएं तथा गजलें हैं, तो दूसरे में संपादकीय लेख, संस्मरण, सफरनामा, साक्षात्कार और अनुवाद जैसे उनके पत्रकारीय काम शामिल हैं. मुद्गल जी की पहली कहानी 1953 में छपी- आगरा के युवा लेखक संघ की पत्रिका में. उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि 1958 में लखनऊ पहुँचने पर उऩकी रुचि कहानियों के प्रति बढ़ गयी. मुद्गल जी अपने व्यवस्थित कहानी लेखन की शुरुआत 1961 से मानते हैं, जब दस्तकें शीर्षक से उन्होंने कहानी लिखी. हालांकि उनकी पहली जिस प्रकाशित कहानी ने लोगों का ध्यान खींचा, वह थी- ...और कुत्ता मान गया, जो 1962 में धर्मयुग में छपी.

नागर जी की कहानियों में जैसी व्यंग्यधर्मिता है, वैसी ही मुद्गल जी की कहानियों में दिखाई पड़ती है. मगर नागर जी की कथा भूमि व संवेदना दूसरी है और मुद्गल जी की दूसरी. यों अमृतलाल नागर की संगत में आने के बाद ही मुद्गल जी का कथा साहित्य की ओर झुकाव बढ़ा. देवेन्द्र कुमार चौबे से एक बातचीत में उन्होंने अमृतलाल नागर की आत्मीयता को बहुत शिद्दत से रेखांकित किया है. वे कहते हैं-
उनके संपूर्ण व्यक्तित्व में जो बात आकर्षित करती है, वह है- हरेक के प्रति सहज आत्मीयता.
और यह आत्मीयता ही मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है और यही आत्मीयता उनकी रचना में दीख पड़ती है- जो उनकी एक अलग पहचान बनाती है.
(अवध नारायण मुद्गगल समग्र-2/ पृ.-320).

मुद्गल जी लेखन में  भाषा व कला के व्यामोह में कभी नहीं पड़े. महेश दर्पण ने उचित ही रेखांकित किया है-
अवधनारायण मुद्गल के यहाँ कथा की भाषा में वस्तु, उसके चमकीलेपन में खो जाने के रास्ते पर कभी नहीं पहुँचती बल्कि वह अपने पूरे विचार के साथ खिलकर कथा में बोलती है.
( अवधनारायण मुद्गल समग्र-1, पृ.-8).  
मुद्गल जी यशपाल के भी संपर्क में  रहे. राजेंद्र सिंह बेदी उनके सबसे प्रिय कथाकारों में थे. मुद्गल जी रंगीन तबीयत के भी आदमी थे. उन्हें किन चीजों में रस मिलता था, इसका थोड़ा-बहुत आभास आप तब पाते हैं, जब बेदी को याद करते हुए अपने एक संपादकीय में वे लिखते हैं-
बेदी को अच्छी चीज़ हमेशा पसंद आयी. चाहे वह औरत हो, चाहे मजाक और चाहे अफसाना.
हालांकि बेदी को इन सबके कारण काफी विवादों का सामना करना पड़ा पर मुद्गल जी अंत-अंत तक लगभग भले मानुष की अपनी छवि बचा ले गये. हालांकि उस दौर में मुद्गल जी ने भी अपनी परिवार की परंपरा को तोड़ते 17 फरवरी 1965 को चित्रा जी से अंतर्जातीय विवाह किया, जो अत्यंत सफल रहा.

नई कहानी और अकहानी के बीच संघर्ष का वह दौर था, जब मुद्गल जी की महत्वपूर्ण कहानियाँ प्रकाश में आयीं, जिसमें महानगरीय जीवन की जगह कस्बों के जीवन की छायाएं अधिक हैं. जबकि महानगरीय बोध व समाज उस समय हिंदी कहानी पर हावी हो रहा था. अवध नारायण मुद्गल की कहानियों के पात्र प्रायः अपने अहम् व सामंती संस्कार के कारण अपने वास्तविक यथार्थ को स्वीकारने की जगह एक बनाये हुए व्यामोह या महत्वाकांक्षा में फंसते चले जाते हैं, अपने अतीत व अहंकार से चिपके रहते हैं, इस तरह वे सामंती जीवन शैली व मनुष्य की प्रदर्शनप्रियता, कुंठा के खोखलेपन को सामने लाते हैं.

किस तरह की सामंती मानसिकता शहरी मध्यवर्गीय लोगों में पायी जाती है, इसे उन्होंने खूब पहचाना. उनकी मजबूरी, आत्मविश्वासहीनता व कायरता को भी पहचाना. अवधनारायण मुद्गल ने स्मृतियों के आधार पर कम लिखा बल्कि वे वर्तमान अनुभवों के आधार पर लिखते रहे. वे एक गाँव से आये थे, पर उनके यहाँ ग्रामीण समाज की कहानियाँ नहीं हैं. उनके कहानियों का समाज शहरी मध्यवर्गीय समाज है. महेश दर्पण ने बहुत सही पकड़ा है-
लेखक के जीवन से परिचित कोई भी व्यक्ति हैरान हो सकता है कि इन कहानियों में किसान जीवन सिरे से नदारद है. नॉस्टेल्जिया का कहीं नाम तक नहीं. और तो और लेखक को अपना उदास कैशौर्य भी याद नहीं आता है. वह पूरी तरह वर्तमान का, अपने वर्तमान का रचनाकार है. उसे मध्यवर्गीय शहरी कथा स्थितियाँ ही आकर्षित करती हैं. इनमें भी चरित्र ही प्रमुख हैं."
( अवधनारायण मुद्गल समग्र-1, पृ.-10-11)
मुद्गल जी के लेखन में गैप बहुत है. जैसे बीच-बीच में उनके लेखन की गाड़ी ट्रैक से उतर जा रही हो. इसके जो भी कारण रहे हों पर इस स्थिति ने उनके लेखकिय व्यक्तित्व का बहुत नुकसान किया है. निश्चित तौर पर यह लेखकीय आलस्य से अलग कोई और मामला है. किसी एक विधा पर केंद्रित न हो पाना भी उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक बड़ा संकट है. अपनी स्मृतियों से जिस तरह वे लेखन में बचे हैं, वह भी हैरान करने वाली चीज है.
एक बड़ा लेखक वह होता है, जो अपने समय के मूलभूत संकटों को पहचानता है और अपने समय के उन सवालों-समस्याओं से टकराता है, जो भविष्य में भी मानव जीवन और देशकाल प्रभावित करने वाले होते हैं. आज हम जिस तरह की सांप्रदायिकता और विसंस्कृतिकरण से जूझ रहे हैं, उसे मुद्गल जी ने अपने समय में ही पहचान लिया था. सांप्रदायिक ताकतों को फटकारते हुए उन्होंने लिखा है-
हमें हँसी आती है यह सुनकर कि एक अदद कुत्ता, बिल्ली, गाय या सूअर के लिए लोग पागलों की तरह लड़ मरे, सैकड़ों इंसानी जिंदगियाँ खत्म हो गयीं.
क्या सैकड़ों इंसानों की जिंदगी इस एक अदद जानवर की जिंदगी से भी गयी-गुजरी है?
अगर ये दंगे, ये कत्ल आदमी के हक के लिए, जिंदगी की बुनियादी जरूरतों के लिए हुए होते तो भी इन पर दूसरे नजरिये से सोचा जा सकता था, लेकिन यहाँ तो माजरा ही कुछ और है
(अवध नारायण मुद्गल समग्र-2/ पृ.- 35-36)
जिस तरह आज अपना देश पूँजीपतियों और दुनिया की वर्चस्वशाली ताकतों के चंगुल में फँसता जा रहा है और उससे आम जनता के जीवन में जो समस्याएं जगह बना रही हैं, इसे मुद्गल जी ने काफी पहले अपने एक संपादकीय में उठाया था-
आज राजनीतिक सत्तात्मक साम्राज्यावाद का प्रसार संभव नहीं है, इसलिए महाशक्तियाँ आर्थिक और सैनिक मदद के नाम पर अपनी समर्थक सरकारों की स्थापना में यकीन करने लगी हैं और उन डमी सरकारों पर उनके शिकंजे इतने सख्त होते हैं कि अपनी इच्छा से उन सरकारों का साँस लेना दूभर हो जाता है.
जहाँ तक हो सके हमें इन स्थितियों से पूरी तरह सत्तर्क रहना चाहिए.
ये शक्तियाँ केंद्र सरकारों को मुट्ठी में करने के बाद आम लोगों के जमीर को खरीदने या समाप्त करने में जुट जाते हैं- और तब शुरू होता है विसंस्कृतिकरण का खतरनाक दौर.
(अवधनारायण मुद्गल समग्र-2/पृ.-39-40)

यह विसंस्कृतिकरण का खतरनाक खेल अपने नये रंग-रूपों के साथ बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे समय में मुद्गल जी स्वाभाविक तौर पर याद आती है.
15 अप्रैल, 2015 को मुद्गल जी का निधन हो गया. वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बहुत खराब स्वास्थ्य स्थितियों से जूझ रहे थे, मगर उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा था. वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे. हो सकता है, उनके लिखे के कुछ और पृष्ठ भविष्य में सामने आएं और कोई उत्साही लेखक उनके समग्र मूल्यांकन का दायित्व भी महसूस करे. हमारे बहुत सारे लेखक उपेक्षा से भी मार दिये जाते हैं. मुद्गल जी के साथ ऐसा तो नहीं होना चाहिये. आखिर उन्होंने न जाने कितने लोगों को मंच दिया है.
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हरे प्रकाश उपाध्याय
कवि, कथाकार, संपादक (मंतव्य)
सम्पर्क : 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णानगर,
लखनऊ-226023