सबद - भेद : भारतेंदु और भाषा की जड़ें : बटरोही

Posted by arun dev on अक्तूबर 30, 2017

















राजनीतिक युद्ध पहले विचारों  के रणक्षेत्र में लड़े जाते हैं और यह लड़ाई भाषा से शुरू होती है. 

औपनिवेशिक भारत में खासकर आज के हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाषा और शिक्षा को लेकर चेतना और प्रतिरोध की जो शुरुआत हुई थी उसके (सु/कु)परिणाम आज हमारे सामने हैं.

हिंदी के पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भाषा और शिक्षा को केंद्र में रखकर स्थापित हंटर कमीशन (१८८२) के प्रश्नों के प्रतिउत्तर में जो विचार व्यक्त किये थे वे स्थाई महत्व के हैं. वरिष्ठ लेखक बटरोही ने  भाषाई जड़ो की तलाश में उस समय की भाषा सक्रियता को गम्भीरता से समझा  परखा है. आज १३५ साल बाद इन्हें देखना दिलचस्प और विचारोत्तेजक है.


कहाँ हैं हिंदी लेखक की स्थानीय जड़ें
भाषा शब्दों से नहीं, आशय से बनती है                       

बटरोही


पिछले तीन-चार दशकों में हिंदी समाज के पढ़े-लिखे मध्य-वर्ग में एक खास बात देखने में आई है कि संसार की तमाम समृद्ध भाषाओँ के साहित्य के प्रति उसकी जितनी रुचि बढ़ी है, अपने समाज और भाषाओँ के प्रति उतनी ही उदासीनता दिखाई देती है. मुझे यह उदासीनता कभी-कभी उसकी जड़ों से कटे होने के कारण महसूस होती है. मगर बार-बार यह हिंदी समाज जिस तरह अपनी स्मृतियों की ओर छलांग लगाने के बाद खाली हाथ उदास चेहरे के साथ अपने वर्तमान में लौट-लौट आता है, उसकी आँखों के आगे मुझे फिर-से वही अनुत्तरित सवाल टंगा दिखाई देता है कि कहाँ हैं हम हिंदी लेखकों की जड़ें?... हमारी स्मृतियाँ और जड़ें क्या एक-दूसरे के सामने टंगे हुए मांस के निर्जीव लोथड़ों की तरह हमारे अतीत के परस्पर विरोधी दो टुकड़े मात्र हैं?...

विचार की भाषा के रूप में औपनिवेशिक भारत और उसके महान अतीत की समृद्ध कलाएँ; हजारों वर्षों की साधना से निर्मित जीवन की अतल गहराइयों में डूबी हुई... जिनकी समझ का संस्कार न होते हुए भी मन करता है कि सारी जिंदगी उसको समर्पित करते हुए उसकी गोद में बैठकर यों ही उम्र बिता दी जाए...

नहीं. मैं उलाहना नहीं दे रहा हूँ, न ईर्ष्या है यह... उलाहना देने या ईर्ष्या करने के लिए जो पात्रता चाहिए, मेरे पास वह है भी नहीं, तब भला मैं किस अधिकार से ऐसी इच्छा पाल सकता हूँ!...

पिछले कुछ वर्षों में हमारे हिंदी समाज में सामने आए दर्जनों कला-रूपों; फिल्मों. शिल्पकारों और चित्रकारों की कलाकृतियों,  डिजिटल माध्यमों से उभरी अभिव्यक्तियों के बीच से गुजरते हुए एक अजीब-सी अवसादमय अनुभूति होती रही है; ऐसी अनुभूति जिसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं!... तो क्या  अहसास और अनुभूति को व्यक्त करने के लिए शब्द जरूरी नहीं है?... तब स्मृतियों और अनुभूतियों की जो लम्बी शृंखला हमें सुदूर अतीत के साथ जोड़े हुए है, क्या है वह...

क्या है वह अहसास जो स्मृतियों में टंगे हुए समूची मानवता के असंख्य आत्मीय चेहरों के बीच खोया हुआ अपना चेहरा तलाश रहा है और थका-हारा खाली हाथ लौट-लौट आता है; इस अनुत्तरित सवाल के साथ कि कहाँ हैं मेरे स्थानीय परिजनों के चेहरे... जो मानो बार-बार मुझसे सवाल पूछते हैं, कहाँ बिसरा दिया है तुमने हमें?...

कुछ वक़्त पहले तक तो मुझे उन सवालों से जुड़ी आवाजें सुनाई देती थीं, मगर अब आवाज गायब हो गयी है; अब तो उनकी वो भौंचक आँखें भी नहीं दिखाई देतीं, जो सहारे की तलाश में लम्बे समय तक मेरे इर्द-गिर्द मंडराती रहती थी... संभव है, वो आँखें आज भी मुझे खोज रही हों, वो अब भी मेरे इर्द-गिर्द मौजूद हों... या हो सकता है, मैं ही अब बूढ़ा और कुंठित हो गया हूँ, लाचार, क्रूर, स्वार्थी या अवसादग्रस्त...



(एक)
जिस प्रसंग का मैं जिक्र करने जा रहा हूँ, हालाँकि उसका वक़्त बताना जरूरी नहीं है... एक सप्ताह, एक महीने, एक वर्ष या कुछ वर्ष पुरानी बात हो सकती है वह बात; मगर इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है...

किस्सा नंबर एक
तल्लीताल से राजभवन की ओर अपने स्कूल जाते हुए छठी कक्षा में पढ़ने वाले उस कुमाउनी बच्चे से मैंने उसका नाम पूछा था तो हिंदी में पूछे गए मेरे सवाल का उसने अंगरेजी में जवाब दिया. थोड़ा नाराजी भरे अंदाज में जब मैंने उससे कहा कि क्या उसे हिंदी नहीं आती, उसने बिना किसी झिझक के, पुराने विश्वास के साथ फिर से अंगरेजी में बताया कि हाँ, हिंदी उसे नहीं आती. ‘स्कूल में टीचर चाहते हैं कि मैं इंग्लिश में बोलूँ और घर में पेरेंट्स चाहते हैं कुमाउनी सीखूं. हिंदी मैं क्यों बोलूँ?’


किस्सा नबर दो
1994 में कवयित्री महादेवी वर्मा के घर ‘मीरा कुटीर’ को संग्रहालय का रूप देने के बाद उसके उद्घाटन के लिए उस वक़्त के सर्वाधिक चर्चित कथाकार निर्मल वर्मा और कवि अशोक वाजपेयी को बुलाने का निर्णय लिया गया. संग्रहालय के रख-रखाव के लिए जो समिति बनाई गई थी, उसके अध्यक्ष नैनीताल के जिलाधिकारी थे और मैं सचिव.

मेरे लिए यह एक विचित्र अनुभव था कि मेरे दोनों अतिथि जिलाधिकारी के साथ अंगरेजी में बातें करते थे. संयोग से उस वक़्त मेरे सहपाठी रहे (स्व) रघुनन्दन सिंह टोलिया कुमाऊँ कमिश्नर और उत्तर प्रदेश प्रशासन अकादमी के निदेशक थे और उन्होंने ही अतिथियों के स्वागत और आतिथ्य की व्यवस्था की थी. शुरू-शुरू में मेरे अतिथि टोलिया जी से भी अंगरेजी में ही बातें करते थे, मगर बाद में उनके द्वारा हिंदी में जवाब देने पर कुछ असहज-से दिखाई देते हुए हिंदी में बोलने लगे थे. बाद में जब मैंने टोलिया जी से इस बाबत चर्चा की तो उन्होंने सहज ढंग से कहा, ‘हाँ, आईएएस ऑफिसर खुद को अंग्रेजी में ज्यादा सहज महसूस करते हैं.’




(दो)    
अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए मैं आपको सुदूर अतीत में आधुनिक हिंदी के अपने पहले पुरखे भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के पास लिए चलता हूँ.

प्रसिद्ध इतिहासकार रामगोपाल (1925) की 1964 में एक किताब प्रकाशित हुई थी, ‘स्वतंत्रता-पूर्व हिंदी के संघर्ष का इतिहास’. हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग द्वारा प्रकाशित इस पुस्तिका की शुरुआत 1882 ईस्वी में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के द्वारा गठित शिक्षा आयोग को सौंपी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की एक लम्बी रिपोर्ट से की गई है. रिपोर्ट में भारत में लागू किये जाने वाले शिक्षा के ढाँचे तथा विद्यार्थियों की माध्यम-भाषा को लेकर सुझाव आमंत्रित किये गए हैं. तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड मेयो ने प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री विलियम हंटर की अध्यक्षता में भारतीयों के लिए शिक्षा से जुड़े इस आयोग का गठन किया था. आयोग ने भारत के हिंदी क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों को 66 प्रश्नों की सूची भेजी (वीरभारत तलवार के अनुसार 70) ताकि उन उत्तरों के जरिये वे अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे सकें. प्रश्नावली में इस बात पर खास जोर दिया गया था कि उस दौर में नए सरकारी स्कूलों के स्थान पर शिक्षा प्रदान करने के लिए जो देसी स्कूल प्रचलन में थे, वो किस तरह की और किस भाषा में शिक्षा देते थे और भारतीय लोग कैसी और किस भाषा में शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे.

किताब की शुरुआत करते हुए रामगोपाल लिखते हैं :

मेरे अध्ययन, खोज और अनुसंधान का विशेष विषय राजनीतिक इतिहास रहा है. मेरी अधिकांश पुस्तकें भारतीय इतिहास के अंगरेजी काल पर हैं. जब मैं अपनी एक पुस्तक के लिए सामग्री की खोज कर रहा था, तब मुझे एक सरकारी प्रतिवेदन में भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक ‘वृहत्’ वक्तव्य देखने को मिला. सन 1882 ईस्वी में भारत सरकार ने एक शिक्षा आयोग नियुक्त किया था, जिसके अध्यक्ष प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम हंटर थे. वह उस समय एक सरकारी अफसर थे. आयोग ने विभिन्न प्रान्तों में जाकर शिक्षा की स्थिति की जाँच की और उस समय के सार्वजनिक जीवन के गणमान्य व्यक्तियों तथा शासन से सम्बन्धित अफसरों की राय प्राप्त की. उसने एक प्रश्नावली भी प्रकाशित की, और जनता के उत्तर आमंत्रित किये. उत्तर प्रदेश (यह प्रदेश उस समय पश्चिमोत्तर प्रान्त कहलाता था) के जिन लोगों ने प्रश्नावली के उत्तर दिए, उनमें भारतेंदु भी थे. (प्रत्येक उत्तरावली को प्रतिवेदन में ‘वक्तव्य’ की संज्ञा दी गई है.) यह सब वक्तव्य अंगरेजी में हैं. जब मैं प्रतिवेदन के पन्ने पलट रहा था, तब मेरी दृष्टि ‘बाबू हरिश्चंद्र’ – यही शब्द शीर्षक में दिए हुए हैं – के नाम पर पड़ी. मेरे मन में असाधारण उत्सुकता पैदा हुई. एक तो भारतेंदु के प्रति मेरी श्रद्धा अत्यधिक रही है, दूसरे  यह वक्तव्य अंगरेजी में था; इससे पहले मैंने कभी उनका कोई अंगरेजी भाषा का लेख नहीं पढ़ा था. मैंने उसे आदि से अंत तक पढ़ा. प्रतिवेदन में जितने वक्तव्य प्रकाशित हैं, उनमें शायद यह सबसे बड़ा है. इसमें उस समय की शिक्षा-सम्बन्धी समस्याओं का विस्तृत वर्णन है. भारतेंदु के विचारों से हिंदी के पाठक साधारणतया अनभिज्ञ नहीं हैं, परन्तु उनका यह ‘वक्तव्य’ पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यही एक ऐसी कृति है, जिसमें उनके विचार एक स्थान पर विस्तार के साथ दिए हुए हैं...

मैंने उनकी कृतियों के संकलन तथा उनसे सम्बन्धित साहित्य का पुनः अवलोकन किया; परन्तु किसी में मुझे यह ‘वक्तव्य’ नहीं मिला. इसलिए मैंने निश्चय किया कि प्रतिवेदन से वक्तव्य की नक़ल ले ली जाये और उसका हिंदी अनुवाद हिंदी जगत के सामने प्रस्तुत किया जाये. यूँ तो भारतेंदु द्वारा लिखित कोई चीज भी अमूल्य है, परन्तु इस वक्तव्य की विशेषता यह है कि इसको पढ़ने के बाद पाठक को लगता है, मानो उसमें आज (1964-बटरोही) की समस्याओं के उत्तर दिए गए हैं. (ये समस्याएं 2017 में आज भी प्रासंगिक हैं.) इतिहास की दृष्टि से यह उत्तरावली उस समय के हिंदी संघर्ष के इतिहास के अति महत्वपूर्ण पृष्ठ हैं; अतः मैं उसका अनुवाद प्रस्तुत पुस्तक के साथ परिशिष्ट के रूप में दे रहा हूँ.” (पृष्ठ 7-8)
(मैं यहाँ पर इस प्रसंग को लेकर 2002 में प्रकाशित वीरभारत तलवार की बहुचर्चित किताब ‘रस्साकशी’ पर जानबूझकर बातें नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि उसमें इतने विवादास्पद और पूर्वाग्रहग्रस्त विचार हैं कि मेरी बहस भटक जाएगी.) 

लेखक रामगोपाल के अनुसार, ‘प्रस्तुत पुस्तक की कहानी जिस काल से आरंभ होती है, वह भारतेंदु से बहुत पहले का है. 19वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की विभिन्न प्रांतीय भाषाओँ ने फारसी का – जो उस समय अदालतों की भाषा थी – स्थान लेना आरंभ कर दिया था; पर उत्तर प्रदेश में फारसी का स्थान हिंदी के बजाय उर्दू को दिया गया. इस घटना से पहले ही हिंदी भाषा और नागरी लिपि की लोकप्रियता तथा उत्तमता का अंगरेज लेखकों तक ने पक्ष लेना आरंभ कर दिया था. उन लेखकों की सम्मतियाँ हिंदी के संघर्ष के प्रथम चरण माने जाते हैं... इन सम्मतियों को पढ़ने के बाद मन में यह विचार पैदा होना स्वाभाविक है कि हिंदी को अदालती भाषा या राजकीय भाषा बनाने की माँग भारत के लोगों द्वारा उठनी चाहिए थी; उन्हें इसके लिए संघर्ष करना चाहिए था. इसका उत्तर कहीं नहीं मिलता. शायद कोई संघर्ष हुआ ही नहीं. वह युग घोर साम्राज्यवाद और घोर सामंतवाद का युग था जिसका प्रभाव चिरकाल तक रहा. परिणाम यह हुआ कि जनता ने भाषा के प्रति हुए अपमान को भी वैसे ही स्वीकार कर लिया जैसे पराधीनता को किया था. सन 1857 के 15-20 वर्ष बाद जब अंगरेजी सत्ता दृढ़ हो गई और शासकगण प्रजा की बात सुनना अपना कर्तव्य समझने लगे, तब हिंदी का प्रश्न कुछ साहस के साथ उठाया जाने लगा. यही साहस-प्रदर्शन हिंदी के संघर्ष का इतिहास है... अदालत की भाषा हिंदी भाषा होनी चाहिए, यह एक ऐसी माँग थी, जिसकी स्वीकृति से अंगरेजी सत्ता को प्रत्यक्षतः कोई हानि नहीं पहुँच सकती थी. तो तर्क यह उठता है कि अंगरेज सरकार ने इसको स्वीकार क्यों नहीं किया, या स्वीकार किया तो अंशतः ही क्यों किया.’

इस पहेली के पीछे छिपे आशय को खुद ही स्पष्ट करते हुए रामगोपाल लिखते हैं, ‘सन 1873 में बिहार सरकार द्वारा यह माँग स्वीकार कर ली गई थी कि उस प्रान्त की अदालतों में फारसी अक्षरों के बजाय नागरी का प्रयोग किया जाय, इस आदेश के कार्यान्वयन में लगभग 8 वर्ष लग गए. इसी प्रकार की माँग का उत्तरप्रदेश में कोई फल क्यों नहीं निकला? इसका स्पष्ट उत्तर कहीं देखने को नहीं मिलता; अतः अप्रत्यक्ष उत्तर का सहारा लेना पड़ता है. 19वी सदी के सातवे दशक के आरम्भ में वर्षों तक भारत के एक भाग में, जिसमें बंगाल और बिहार उल्लेखनीय हैं, बहावी आन्दोलन का जोर था. बहावी फिरके के मुसलमान हिंसात्मक क्रांति द्वारा अंगरेजी शासन का अंत करके मुस्लिम सत्ता पुनः ज़माने के लिए क्रियाशील थे. बिहार के विषय में अंग्रेजों के मन में यह धारणा बन गई थी कि वहाँ का प्रत्येक मुसलमान बागी है. इस तर्क से यह निष्कर्ष निकलना स्वाभाविक लगता है कि वहाँ अंगरेजी सरकार को यह अंदेशा नहीं था कि फारसी अक्षर का स्थान नागरी को दे देने से मुसलमान क्रुद्ध हो जायेंगे; वे तो क्रुद्ध थे ही. यद्यपि उस समय मुसलमानों की ओर सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव करने की नीति का आरम्भ हो गया था, परन्तु फिर भी हिन्दुओं के प्रति सरकार अधिक उदारता बरतती थी और हिंदी हिन्दुओं की भाषा मानी जाती थी...

‘उत्तर प्रदेश में स्थिति भिन्न थी. वहाँ बहावी आन्दोलन का प्रभाव बहुत कम था. जब कि बंगाल और बिहार में मुसलमानों को सरकारी नौकरी से यथासंभव दूर रखा जाता था, उत्तर प्रदेश में मुसलमान जहाँ-तहाँ सरकारी पदों पर नियुक्त थे; और वे उर्दू के माध्यम से अपना काम करते थे.’



(तीन)


मेरे लिए ये विचार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्विवाद निर्माता भारतेंदु हरिश्चंद्र के विचार हैं. भारतेंदु ने यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी है, जिसका खुद के द्वारा किया गया अनुवाद मूल के साथ रामगोपाल ने यथावत अपनी इस किताब में संकलित किया है.
इस पुस्तक में पहला ही सवाल भारतेंदु से (जिन्हें प्रतिवेदन में ‘बाबू हरिश्चंद्र’ लिखा गया है) पूछा गया है : ‘यह बताने की कृपा करें कि भारत में प्रचलित शिक्षा के विषय में आपका मंतव्य किन अनुभवों पर आधारित है. और वे अनुभव आपको किस प्रान्त में प्राप्त हुए हैं?’
भारतेंदु जी ने उत्तर दिया है, ‘शिक्षा में सदैव ही मेरी अभिरुचि रही है. मैं संस्कृत, हिंदी और उर्दू का कवि हूँ और पद्य और गद्य में मैंने बहुत-सी पुस्तकों की रचना की है. मैंने ‘कवि वचन सुधा’ नामक एक हिंदी पत्रिका भी आरम्भ की थी, जो अब भी चल रही है. अपने देश-वासियों के शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाना, इस प्रान्त की भाषा में सुधार करना, तथा इस भाषा में साहित्य-वृद्धि करना सदैव से मेरा ध्येय रहा है. अपने देशवासियों की शैक्षिक उन्नति से मुझे सदैव हर्ष प्राप्त होता है. प्राथमिक शिक्षा के लिए मैंने बनारस में एक पाठशाला स्थापित की है. मैं बनारस शिक्षा समिति का सदस्य भी था, अतः मुझे शिक्षा विभाग से सम्बन्धित व्यक्तियों तथा अन्य विद्वानों के संपर्क में आने के बहुत अवसर मिलते रहे हैं. विद्योन्नति के उद्देश्य से मैंने सरकारी स्कूलों और कालिजों के विद्यार्थियों तथा विद्याव्यसनियों को पुरस्कार भी दिए हैं.
‘मैं पश्चिमोत्तर प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, जबलपुर, सागर तथा अजमेर डिविजन - रामगोपाल) का निवासी हूँ. मेरा अनुभव इस प्रान्त तक सीमित है.’ 

दूसरे सवाल में जब उनसे पूछा गया कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था क्या सुदृढ़ नींव पर आधारित है और क्या पाठ्यक्रम में सुधार के लिए वो कोई सुझाव देना चाहेंगे, उन्होंने बहुत विश्वास के साथ कहा कि हमारे प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा एक सुदृढ़ नींव पर स्थापित हो गई है और अगर इसमें मामूली से संशोधन कर दिए जाएँ तो वह जनता की जरूरतों के हिसाब से आदर्श रूप ले सकती है.

सुझाव देने से पहले भारतेंदु उनके समय में प्रचलित 7 प्रकार के विद्यालयों का जिक्र करते हैं :
1. चटसाल, जो पहाड़े, जबानी हिसाब, गणित के चार नियम तथा नागरी, कैथी या महाजनी लिपि की शिक्षा देते हैं;
2. संस्कृत पाठशालाएँ जो संस्कृत द्वारा विभिन्न विषयों की शिक्षा देते हैं, जैसे गणित, ज्योतिष, खगोल विद्या, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, साहित्य, व्याकरण और न्यायशास्त्र.
3. धार्मिक स्कूल, जो वेद और वेदों के विभिन्न भाष्यों (मीमांसा, वेदांत आदि)की शिक्षा देते हैं,
4. व्यवहार गणित स्कूल, जिनका सञ्चालन मुनीम लोग करते हैं;
5. मकतब, अर्थात वे स्कूल, जो फारसी साहित्य की शिक्षा देते हैं;
6. अरबी स्कूल, जो अरबी साहित्य, व्याकरण और तर्कशास्त्र की शिक्षा देते हैं (कहीं-कहीं दर्शन शास्त्र, औषधि शास्त्र, ईश्वरीय ज्ञान शास्त्र जैसे विषय भी मुसलमान लड़कों को मुफ्त में पढाये जाते हैं) और
7. कुरान स्कूल, जब कोई संपन्न मुसलमान मस्जिद बनवाता है तो कुरान का पाठ और प्रार्थना वाचन के लिए एक मुल्ला की नियुक्ति कर देता है, जिसमें किसी लड़के को सारी कुरान रटा दी जाती है और उसे हाफिज की उपाधि दी जाती है.
शायद यही कारण था कि भारतेंदु ने हंटर आयोग को पहला सुझाव शिक्षा समितियों के पुनर्गठन का दिया. उनके अनुसार,

‘शिक्षा समितियों के द्वारा स्कूलों के प्रबंध-संचालन की वर्तमान पद्धति आपत्तिजनक है. समितियों के सरकारी सदस्यों को इतना समय नहीं मिलता कि वे दूर देहात में स्थापित स्कूलों की देख-रेख कर सकें. गैर-सरकारी सदस्य ही बहुत संख्या में समिति की बैठकों में उपस्थित होते हैं. उनकी उपस्थिति का कारण यह नहीं है कि उनमें देश की शिक्षा के प्रति प्रेम या थोड़ा-सा भी चाव है, वरन यह है कि वे इन समितियों की सदस्यता को गौरव मात्र समझते हैं, और इनके द्वारा उन्हें जिलाधीश के सम्मुख आसन ग्रहण करने का अवसर मिल जाता है.

शिक्षा समितियों के बहुत-से सदस्यों से मैं परिचित हूँ. उन्हें अपने प्रान्त की भाषा तक का ज्ञान नहीं है. कुलीन जनों में उनकी गणना होने के कारण उन्हें सदस्य बना दिया गया है. कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें कुलीन भी नहीं कहा जा सकता. कौन ऐसा व्यक्ति है जो अपने जिले के छोर पर स्थापित स्कूल का निरीक्षण करने के लिए यात्रा करेगा, और केवल इस उद्देश्य से कि वहाँ जाकर वह ग्रामीणों को यह उपदेश देगा कि बच्चों को पाठशाला भेजना उनके लिए हितकर होगा या वहाँ जाकर वह मालूम करेगा कि चार रूपए की सूक्ष्म धनराशि जो समिति ने मरम्मत के लिए स्वीकृत की थी, वास्तव में व्यय की गई है या नहीं, और अध्यापक अपने कर्तव्य का पालन करता है या नहीं. हो सकता है कि कहीं कोई व्यक्ति जनहित से प्रेरित होकर अपना समय और धन, बल्कि जीवन तक अर्पण करने के लिए निकल आये; परन्तु उसके प्रयत्न का मूल्य उतना ही होगा, जितना वर्षा की एक बूँद का समुद्र के लिए होता है. 

मेरा मत है कि देश की शिक्षा संचालन के लिए एक पृथक विभाग होना चाहिए, वैसे ही जैसे पुलिस, माल, न्याय, डाक-तार आदि के संचालन के लिए अलग-अलग विभाग हैं. यदि कोई जन-हितैषी व्यक्ति शिक्षा विभाग की सहायता करना चाहता है तो अच्छा यह होगा कि उसे स्कूलों का अवैतनिक इन्स्पेक्टर या संयुक्त इन्स्पेक्टर नियुक्त कर दिया जाय जिससे कि विभाग के प्रबंध में उसका भी हाथ हो जाय. शिक्षा बोर्ड की नाममात्र सदस्यता की अपेक्षा यह युक्ति अधिक उत्तम होगी...

‘शिक्षा समितियों का जितना मुझे ज्ञान है उसके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि वे व्यर्थ की संस्थाएं हैं. मैं कुछ ऐसे सदस्यों को जानता हूँ जिन्हें यह तक मालूम नहीं है कि उनके अधिकार क्षेत्र में कितने स्कूल हैं, या तहसीली स्कूल और हल्काबंदी स्कूल में क्या अंतर है.’
अपनी बात को अधिक विस्तार से समझाते हुए भारतेंदु लिखते हैं, ‘यह तो सच है कि शिक्षा अधिकारियों को जनता में पर्याप्त आदर नहीं मिलता, परन्तु इसके लिए विभाग दोषी नहीं है. इसका कारण यह है कि उसका कार्य अर्थात स्कूलों का निरीक्षण और परीक्षण मूक प्रकृति का है, सरकार के अन्य विभागों से भिन्न. भारत में हुकूमत से आदर प्राप्त होता है. शिक्षा विभाग के अफसर न तो किसी व्यक्ति को हवालात में डाल सकते हैं, न उस पर जुर्माना कर सकते हैं, और न उससे रूपया ऐंठ सकते हैं. उनकी तुलना केवल धर्म-प्रचारकों से की जा सकती है. अज्ञात व्यक्ति की घृणा की परवाह किये बिना वे शुभ कार्य में लगे रहते हैं. इसके विपरीत माल और पुलिस विभाग के नाम से लोगों में भय और प्रतिष्ठा की भावना पैदा होती है. यही कारण है कि माननीय सैयद अहमद खां बहादुर ने अपनी गवाही में यह सुझाव दिया है कि शिक्षा विभाग के लिए अतिरिक्त डिप्टी कलक्टर नियुक्त कर दिए जाएँ. इस दोष को दूर करने का सर्वोत्तम उपचार यह होगा कि इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों की भांति भारत में भी प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर दी जाय और जन-भाषा भाषी को अदालती भाषा बना दिया जाय. तथा अदालत के कागज उस लिपि में लिखे जाएँ, जिसे जनता के अधिकतम लोग पढ़ लेते हैं...

इस प्रान्त की प्राथमिक पाठशालाओं में हिंदी भाषा की लिपि का प्रयोग प्रायः पूर्णतया किया जाता है. परन्तु अदालतों और दफ्तरों में फारसी भाषा की लिपि का प्रयोग होता है; अतः उस प्राथमिक शिक्षा का जो एक ग्रामीण लड़का अपने गाँव में प्राप्त करता है, कोई मूल्य नहीं है, कोई फल नहीं है. उसमें कोई आकर्षण ही नहीं रह जाता. वर्षों तक एक ग्राम पाठशाला में पढ़ने के बाद जब एक जमींदार का लड़का अदालत में जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सब परिश्रम व्यर्थ गया, अपने पूर्वजों की भांति वह भी बिलकुल अज्ञानी है, तथा वह उस घसीट लिपि (उर्दू) को पढ़ने में बिलकुल असमर्थ है जो अदालत का अमला प्रयोग में लाता है. यदि एक निर्धन व्यक्ति के पुत्र को अपने (हिंदी) ज्ञान के भरोसे पर जीविका साधन प्राप्त करने की अभिलाषा है तो उसे शिक्षा विभाग का द्वार खटखटाना पड़ेगा, अन्य विभाग उसे अशिक्षित कहकर वापस कर देंगे.’

  
(चार)

1882 ईस्वी में भारतेंदु ने अपनी गवाही में जो आशंकाएं व्यक्त की थी, आजादी के बाद ही नहीं, उनके जीवन काल से ही भारतीय शिक्षा-नियोजक उन्हीं गलतियों को दुहरा रहे हैं. राजनीतिक शक्तियों का हमारे देश में इतना महिमा-मंडन किया जाता रहा है कि आम लोगों के भावनात्मक निर्णय तक इन नेताओं और प्रशासकों के द्वारा मनमाने ढंग से उन पर लादे जाते रहे. आम लोगों के बारे में निर्णय लेते हुए न तो यह देखा गया कि उन समस्याओं की जड़ें कहाँ हैं और जो लोग निर्णय ले रहे होते हैं, समस्या से जुड़े परिवेश की न तो उन्हें जानकारी होती, और न उनके अस्तित्व के साथ समस्या जुड़ी होती! यही कारण है कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी देश के बारे में वे लोग ऐसे निर्णय लेते रहे जैसे राज्यों और रियासतों का बंटवारा कर रहे हों...

कितने और कैसे सांस्कृतिक समन्वय के दबावों की देन थी अनेक अपभ्रंश और प्राकृत भाषाएँ, हिन्दवी, रेख्ता, कैथी, दक्खिनी, उर्दू आदि भाषाएँ, लेकिन कितनी कुटिलता और निजी सनक की वजह से इन भाषाओँ का मजहबीकरण और सरलीकरण कर दिया गया. अगर आप विगत दो शताब्दियों के हिंदी भाषा के संघर्ष पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि इस कूटनीतिक समझौतावाद और तुष्टीकरण की परिणति ही ‘हिन्दुस्तानी’ या ‘हिंगरेजी’ जैसी नपुंसक भाषाओँ के रूप में हुई जिसका अगला कदम अपनी जातीय भाषा-अस्मिता की हत्या ही हो सकता था. ‘भाषा समस्या’ को ‘भाषा की राजनीति’ बना दिए जाने के पीछे सिर्फ सियासतदानों का हाथ नहीं था, भारत जैसे धर्म और क्षेत्र को लेकर नाजुक-स्वार्थी नजरिया रखने वाले सामंती सोच वाले बुद्धिजीवियों का भी हाथ था, बल्कि उनका अधिक ही था. शायद यही कारण है कि सुदूर अतीत से आरम्भ हुई भारतीय कला-परम्परा की यह यात्रा आजाद भारत की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा नहीं बन पाई. ऐसा कहकर मैं नए भारत और नई दुनिया के नियोजकों की मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा रहा, सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि अगर वे लोग अपने ही इतिहास से सबक ले सके होते तो निश्चय ही स्थिति फर्क होती. 

माना कि हमारे तत्काल अतीत के वे लोग शासक के रूप में बाहर से आए थे, मगर उनके  रोजमर्रा के सरोकारों का सम्बन्ध तो इसी धरती के साथ था. पहले भी ऐसे लोग थे, मगर अंगरेज प्रशासक तो खुद इतने जानकार थे कि खुद ही नीति तय कर सकते थे, मगर उन्होंने जनता से जुड़ा प्रत्येक निर्णय लेने से पहले संसार की यथासंभव श्रेष्ठ प्रतिभा को आमंत्रित किया. 

भारतीय शिक्षा और भाषा के मामलों में नीति तैयार करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने अपने वक़्त के आधिकारिक विद्वानों : लार्ड मेकॉले (इंग्लिश एजुकेशन एक्ट, 1835) और विलियम हंटर (कमीशन ऑफ़ इंडियन एजुकेशन, 1882) को विशेष रूप से आमंत्रित किया और भारतीय जनता आज तक उनके योगदान को याद करती है. क्या यह अनायास है कि आजादी से डेढ़ सौ वर्ष पहले भारतीय भाषा और शिक्षा व्यवस्था के बारे में दी गई मेकॉले और हंटर की संस्तुतियाँ लगभग उसी रूप में हमारे देश में आजादी की आधी सदी के बाद भी लागू हैं. 

हमारी स्थानीय जड़ों की जो व्याख्या वे हमें सौंप गए थे, उनका विस्तार करना तो दूर, हमने अपनी जड़ें उनमें उलझाकर अपना वजूद ही मानो नष्ट कर दिया है. एक आत्महंता का वरण किया है मानो हमने. आम मध्यवर्गीय लोगों के बीच जिस मैकॉले को विगत दो सौ वर्षों में हमने ‘प्राण’ और ‘केएन सिंह’-नुमा बौलीवुडी खलनायकों की तरह अपने दिल में बसाए रखा है (परदे में जिनसे नफरत करते हैं और वास्तविक जिंदगी में प्यार) हममें से ज्यादातर लोगों ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मेकॉले की वास्तव में मंशा क्या थी.
सन 1835 में मेकॉले ने, जो उस समय गवर्नर जनरल की शासन समिति के एक प्रमुख सदस्य थे, अंगरेजी शिक्षा का प्रचार करने के प्रश्न को एक नए उदार ढंग से सरकार तथा अंगरेजी जनता के सामने रखा. उन्होंने अपनी स्मृति टिप्पणी में इस प्रकार के उद्गार व्यक्त किये :
हो सकता है कि योरोपीय शिक्षा-दीक्षा के ग्रहण करने से भारतीय जनता का मस्तिष्क इतना विकसित हो जाए कि वह वर्तमान शासन पद्धति से उकता उठे और वह योरोपीय शासन पद्धति की राजनीतिक संस्थाओं की माँग करने लगे. यह तो मैं नहीं कह सकता कि वह दिन कभी आएगा या नहीं; परन्तु यदि वह आया तो अवश्य ही वह अंगरेजों के इतिहास में अति गर्व का दिन होगा... हो सकता है कि राजदंड हमारे हाथ से निकल जाय... परन्तु क्या ही अच्छी वह विजय है जिसमें दूसरी ओर पराजय होती ही नहीं.” (रामगोपाल : स्वतंत्रता-पूर्व हिंदी के संघर्ष का इतिहास, पृष्ठ 10)
रामगोपाल आगे टिप्पणी करते हैं, ‘एक बार पुनः गवर्नर जनरल की समिति में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को प्रोत्साहन देने के प्रस्ताव का विरोध हुआ. स्वयं गवर्नर जनरल विलियम बेन्टिंग ने कहा – ‘संभव है भारत की देशी शिक्षा पद्धति में हस्तक्षेप करने से लाभ की तुलना में हानि अधिक हो, मैं यह बात अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ; अन्य भारतीय संस्थाओं में हस्तक्षेप करने का फल अच्छा नहीं निकला है.’ महीनों तक मेकॉले की टिप्पणी विवाद का विषय बनी रही, परन्तु अंत में समिति ने बहुमत से मेकॉले के प्रस्ताव को स्वीकार किया कि ‘भारत के लोगों में योरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रसार करना अंग्रेजी सरकार का महान ध्येय होना चाहिए; अतः शिक्षा सम्बन्धी अनुदान की सम्पूर्ण धनराशि का उपभोग केवल अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करने के लिए किया जाय.’

हिंदी, जो कि निश्चय ही समूचे उत्तर भारत की सुपरिचित भाषा थी (स्पष्ट ही अपनी उप-भाषाओँ और बोलियों के कारण), की राष्ट्रीय छवि को अवरुद्ध करने में अंग्रेज प्रशासकों की अपेक्षा क्षेत्रीय और मजहबी सोच के लोगों और देसी संगठनों का भी योगदान है. इनमें से कुछ लोग एक दूसरे के विचारों का प्रतिवाद करते हुए भी दिखाई देते हैं किन्तु साफ दिखाई देता है कि इनका उद्देश्य जन-सामान्य की समस्याओं को सुलझाने के बजाय दिमागी कसरत और भाषा सम्बन्धी अपनी जानकारी का प्रदर्शन है. आर्य समाज, धर्म समाज, वगैरह हिन्दू संगठनों के हाशियों और मिशनरियों के प्रयासों पर बातें बाद में करेंगे, पहले हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवी पक्ष पर बातें.

उदाहरण के लिए ही बिहार में तैनात शिक्षा विभाग से जुड़े तीन अधिकारी,
1. मुंगेर के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट डॉ. ग्रियर्सन,
2. मुंगेर के ही एक अन्य अधिकारी जॉन क्राइस्ट और
3. भागलपुर डिविजन के शिक्षा इन्स्पेक्टर राधिका प्रसन्न मुकर्जी.

तीनों ने हंटर शिक्षा आयोग में अपने विचार व्यक्त किये मगर उनमें जन-भावनाओं का वह स्वर नहीं है जो भारतेंदु के प्रतिवेदन में है. ग्रियर्सन ने 1882 में ही ‘कलकत्ता रिव्यू’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा, (आयोग को अपना वक्तव्य सौंपने वाले दूसरे अनेक लोगों का जिक्र विस्तार के भय से यहाँ नहीं कर पा रहा हूँ, हालाँकि उनमें से अनेक लोगों का योगदान भारतेंदु के बराबर ही था)

‘जो भाषा हिंदी कहलाती है वह बिहार के नव्वे प्रतिशत लोगों की भाषा नहीं है... किताबी हिंदी तो सरकार के आदेश पर बनाई गयी थी, जब 60 या 70 वर्ष पहले ‘प्रेम सागर’ लिखा गया था, यह बनावटी भाषा है; यह तो सच है कि इसका प्रयोग वे हिन्दू करते हैं जिनकी मातृभाषाएं अलग-अलग हैं; क्योंकि हिंदी कोई भाषा नहीं है, और क्योंकि यह सरकार के आदेश पर 60 या 70 वर्ष पूर्व बनाई गयी थी; इसलिए इसे किसी भी हालत में अदालत या स्कूल के लिए न अपनाया जाये... बिहार में शिक्षा विभाग ने हिंदी को मान्यता देकर गलती की है. तुलसीदास की ब्रजभाषा, जो बिहार में कुछ कक्षाओं में पढाई जाती है, बिहार के लिए गैर भाषा है.’ ग्रियर्सन ने ये भी कहा कि ‘हिंदी में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिसे मुसलमान नहीं समझते.’ आदि-आदि.

इसके उलट जॉन क्राइस्ट ने कहा, ‘नागरी हिन्दुओं की सम्मानित लिपि है (जैसा कि इसके नाम से ही प्रकट है) और मैं कह सकता हूँ कि मानव के मस्तिष्क से निकली हुई वर्णमालाओं में यह सबसे अधिक पूर्ण वर्णमाला है; परन्तु यह उतनी तेजी के साथ नहीं लिखी जा सकती जितनी तेजी से कैथी लिखी जा सकती है... रोमन लिपि एक विदेशी वर्णमाला है. इसे लोग पसंद नहीं करेंगे. फारसी लिपि दरिद्र है और अदालती कम के लिए उपयुक्त नहीं है. कैथी ही एक ऐसी लिपि है जो सर्वत्र प्रचलित है. इसका लिखना आसन है; अतः अदालतों में इसी का प्रयोग होना चाहिए.’

राधिका प्रसन्न मुकर्जी ने भी ग्रियर्सन के तर्कों का कड़ा प्रतिवाद किया

‘यह कहना गलत है कि ‘प्रेम सागर’ से पहले हिंदी थी ही नहीं... सदियों  से बंगाली और हिंदी में काव्य साहित्य के खाने मौजूद हैं. यदि वर्तमान काल में हिंदी ने बंगाली के बराबर उन्नति नहीं की है तो इसका कारण यह है कि चालीस वर्ष से अधिक हुए बंगाली, फारसी से छुटकारा पाकर कचहरियों की भाषा मान ली गयी, परन्तु हिंदी सरकार के बारम्बार प्रयत्न के बावजूद भी कचहरी से बाहर है...’

एक अन्य रोचक ‘विद्वत्ततापूर्ण’ तर्क देते हुए मुकर्जी लिखते हैं, ‘यदि हिंदी साधारण बोलचाल की भाषा से भिन्न है, तो इसमें अचम्भे की क्या बात है? मैं अधिकृत रूप से कह सकता हूँ कि जर्मन, अंग्रेजी तथा इटैलियन भाषाओँ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है... फिर बिहार के हिन्दुओं की बनारस तथा लखनऊ के इर्द-गिर्द के प्रदेश की भाषा तथा संस्कृति के प्रति श्रद्धा है.’
(सर सैय्यद अहमद खान)

सबसे रोचक तर्क सर सैयद अहमद खान का है जिन्होंने उर्दू को सभ्यों की और हिंदी (खड़ी बोली) को असभ्यों की भाषा तक कह डाला. इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भारतेंदु ने लिखा, ‘मुझे यह जानकर बहुत खेद हुआ कि माननीय अहमद खां बहादुर, सी. एस. आई., ने आयोग के सामने अपनी गवाही में कहा है कि सुसभ्य वर्ग की भाषा उर्दू है और असभ्य ग्रामीणों की हिंदी है. यह कथन गलत तो है ही, हिन्दुओं के प्रति अन्यायपूर्ण भी है. इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ कायस्थों को छोड़कर, अन्य सब अर्थात् क्षेत्रीय महाजन, जमींदार, यहाँ तक कि आदरणीय ब्राह्मण भी, जो हिंदी बोलते हैं, असभ्य ग्रामीण हैं.’ (पृष्ठ 38)

अपनी गवाही में भारतेंदु ने पूरे विश्वास के साथ जन-भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए लिखा, ‘सभी सभी देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग किया जाता है. यही ऐसा देश है जहाँ अदालती भाषा न तो शासकों की मातृभाषा है और न प्रजा की. यदि आप दो सार्वजनिक नोटिस, एक उर्दू में, तथा एक हिंदी में, लिखकर भेज दें तो आपको आसानी से मालूम हो जाएगा कि प्रत्येक नोटिस को समझने वाले लोगों का अनुपात क्या है. जो सम्मान जिलाधीशों द्वारा जारी किये जाते हैं उनमें हिंदी का प्रयोग होने से रैयत और जमींदार को हार्दिक प्रसन्नता प्राप्त हुई है. साहूकार और व्यापारी अपना हिसाब-किताब हिंदी में रखते हैं. स्त्रियाँ हिंदी लिपि का प्रयोग करती हैं. पटवारी के कागजात हिंदी में लिखे जाते हैं और ग्रामों के अधिकतर स्कूल हिंदी में शिक्षा देते हैं.’ (वही)      

भारतेंदु अपने दृष्टिकोण में अपने समकालीनों की अपेक्षा इसलिए भी अलग और विशिष्ट हैं क्योंकि वह जन-भावनाओं की सीढ़ी अभिव्यक्ति हैं. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीयों के द्वारा भाषा और शिक्षा को लेकर जो भी आवाज उठाई गई, उसमें एक शुद्धतावादी स्वर बहुत साफ दिखाई देता है. जनता के द्वारा गांधीजी को दिए गए विभिन्न प्रतिवेदनों को छोड़ दें तो सीधे सरकार के विरुद्ध पहली आवाज के रूप में श्यामसुंदर दास और मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में आन्दोलन उभरा, हालाँकि यह आन्दोलन अपनी प्रकृति में शांत और शुद्धतावादी था. इस सन्दर्भ में भी रामगोपाल इसी की पुष्टि करते दिखाई देते हैं. उनके अनुसार, “सन 1893 की दो घटनाएँ उल्लेखनीय हैं. 

उस वर्ष काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई. उसी वर्ष रोमन लिपि को भारतीय भाषाओँ के लिए अपनाने का प्रस्ताव पुनः उठाया गया. दो-तीन वर्ष तक उस प्रस्ताव की चर्चा मात्र होती रही. परन्तु 1896 में यह बात दृढ़ता के साथ फैलने लगी कि पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार अदालतों तथा अन्य दफ्तरों में फारसी अक्षरों के स्थान पर रोमन लिपि को प्रचलित करना चाहती है. उस समय नागरी लिपि का कोई सरकारी अस्तित्व नहीं था; रोमन की स्वीकृति से जिस भाषा या लिपि को तुरंत हानि पहुँचने का भय था, वह थी, उर्दू. परन्तु इस प्रस्ताव से उन अनेक लोगों की आकांक्षा पर भी पानी फिर जाता जिन्हें यह आशा थी कि वे हिंदी भाषा और नागरी लिपि को सरकारी दफ्तरों में प्रविष्ट कराकर ही चैन लेंगे. जैसा कि श्री श्याम सुन्दर दास ने लिखा है, ‘यदि एक बार रोमन अक्षरों का प्रचार हो गया तो फिर देवनागरी अक्षरों के प्रचार की आशा करना व्यर्थ होगा.’

इसी वक़्त नागरी प्रचारिणी सभा ने इस प्रस्ताव के विरुद्ध आवाज उठाते हुए धन एकत्र किया और 1896 में ‘नागरी करेक्टर’ (The Nagri Character) शीर्षक से एक पुस्तिका प्रकाशित की. इस विरोध ने कोई आन्दोलन का रूप तो नहीं लिया, परन्तु सरकार के लिए यह जानकारी काफी थी कि जनता में रोमन के प्रति व्यापक विरोध भावना है. सरकार ने इसके लिए एक समिति नियुक्त की जिससे कहा गया कि विवाद का निरीक्षण करके उचित सिफारिश प्रस्तुत करे. समिति ने रोमन के पक्ष में अपनी सहमति दी परन्तु प्रश्न यह था कि सरकार सार्वजनिक भावना को अकारण क्यों ठुकरा दे. अतः उसने समिति की सिफारिश अस्वीकृत कर दी, और 27 जुलाई, 1896 को अपने निर्णय की घोषणा करते हुए कहा कि ‘रोमन के प्रचार से सरकारी अफसर देश की भाषा के प्रति उदासीन हो जायेंगे.’

हिंदी सम्बन्धी आन्दोलन की बागडोर अब पंडित मदन मोहन मालवीय के हाथों में थी. उनके शुद्धतावादी प्रलोभन भी बहुत अनुकूल असर नहीं पड़ा. गवर्नर ने 2 मार्च, 1898 को अपने पत्र में उत्तर दिया, ‘इन प्रान्तों में चार करोड़ सत्तर लाख लोग बसते हैं, और जो अनुसन्धान प्रसिद्ध भाषाविद डॉक्टर ग्रियर्सन प्रत्येक जिले की भाषाओँ की जाँच के सम्बन्ध में कह रहे हैं, उससे यह प्रकट होता है कि इन चार करोड़ सत्तर लाख मनुष्यों में से चार करोड़ पचास लाख मनुष्य हिंदी या उसकी कोई बोली बोलते हैं. अब यदि चार करोड़ पचास लाख मनुष्य उस भाषा को लिख भी सकते जिसे वे बोलते हैं तो निःसंदेह फारसी के स्थान पर नागरी के अक्षरों को प्रचलित किया जाना अत्यंत आवश्यक होता. इन चार करोड़ पचास लाख लोगों में से तीन लाख से कुछ कम लिख और पढ़ सकते हैं और इन शिक्षित लोगों में एक अच्छा अंश मुसलमानों का है जो उर्दू बोलते हैं और फारसी अक्षरों का व्यवहार करना पसंद करते हैं. इससे आप लोग समझ सकते हैं कि यद्यपि मैं नागरी अक्षरों के विशेष प्रचार के पक्ष में हूँ, पर मैं यह बात कह देना उचित समझता हूँ कि जितनी आप लोग समझते हैं उससे अधिक आपत्तियां इसके पूर्ण प्रचार की अवरोधक हैं... मुसलमान लोग, जैसा कि आप लोग अनुमान करते हैं, इस परिवर्तन का विरोध करेंगे..’
इसके बावजूद सर एंटोनी ने यह बात स्वीकार की कि ‘यह उचित नहीं है कि ऐसा पुरुष जो नागरी लिख सकता हो, सरकार के पास भेजने के लिए अपने आवेदन पत्र या मेमोरियल को फारसी भाषा में लिखवाने का कष्ट सहन करे. यह भी अनुचित लगता है कि एक सरकारी आज्ञा जो ऐसे गाँवों के लिए निकाली जाय जहाँ के वासी हिंदी बोलते हों, फारसी अक्षरों में लिखी हो, जिसे उस गाँव में कोई भी न पढ़ सके.’ गवर्नर ने कोई निर्णय नहीं लिया और हिंदी-उर्दू प्रश्न एक राजनीतिक प्रश्न बनकर रह गया.

इस सन्दर्भ में भी भारतेंदु के विचार बहुत स्पष्ट और व्यावहारिक हैं. आज यह बात साफ महसूस होती है कि अगर 1882 में उनके भाषा सम्बन्धी विचारों को अपनाया गया होता तो सामान्य जन के मन में हिंदी की स्थिति कुछ और होती. कम-से-कम हमारा समाज आम जनता का पक्ष ले रहा होता.

हंटर कमीशन ने अपने छठे सवाल में भारतेंदु से पूछा, ‘ग्रामीण क्षेत्रों में प्रारंभिक शिक्षा का प्रसार करने के लिए सरकार किस हद तक सहायता प्राप्त या सहायता रहित निजी जन-प्रयत्न पर निर्भर रह सकती है?

इसके उत्तर में भारतेंदु ने दो टूक शब्दों में कहा, “अभी वह समय नहीं आया है, जब ग्रामीण क्षेत्रों में प्राम्भिक शिक्षा के प्रसार के लिए सरकार निजी प्रयत्नों पर निर्भर रह सके. यदि अप्रत्यक्ष रूप से भी सरकार शिक्षा क्षेत्र से हट जाएगी तो शिक्षा कार्य नष्ट हो जाएगा. चिरकाल से इस देश के निवासी हिन्दू राजाओं और मुसलमान बादशाहों के निरंकुश शासन के अधीन रहे हैं, इसलिए उनमें निर्भरता तथा दासता की आदत पड़ गयी है. या आदत उनके स्वभाव में समा गई है. उनके स्वभाव को स्वाधीनता के मुक्त विचारों से प्रेरित करने में अंग्रेजी सरकार के दयालु शासन को बहुत दीर्घ समय लगेगा. 

भारत में, जहाँ अभी सभ्यता का प्रभात ही है, ऐसा कदम अभी असामयिक होगा. हमें यह न भूल जाना चाहिए कि इंग्लैण्ड तथा अन्य यूरोपीय देशों में, जो सभ्यता से सम्बंधित सभी बातों में हमसे बहुत आगे हैं, प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य है. यदि हम शिक्षा विभाग के परिलेखों पर दृष्टि डालें तो हम देख सकेंगे कि सरकारी प्रयत्न द्वारा इस देश में शिक्षा ने कितनी प्रगति की है. यद्यपि इस देश के लोग प्राथमिक शिक्षा के लिए स्थानीय टैक्स देते हैं परन्तु उन्हें इस बात की कोई खास परवाह नहीं है कि उनके गाँव में कोई स्कूल खोला जा रहा है या बंद किया जा रहा है. वे शिक्षा कर का भुगतान यह समझ कर करते हैं कि यह सरकारी कर है. उनमें यह विचार पैदा नहीं होता कि इसके साथ उनका हित भी सम्बद्ध है. सीधे सरकारी हस्तक्षेप से ही यह देश समृद्धि की और अग्रसर हो सकता है.” (पृष्ठ 92)
Sir William Wilson Hunter

अंग्रेज प्रशासकों ने धर्म के आधार पर हिंदी-उर्दू विवाद खड़ा करके भाषा के मामले को कुछ हद तक लटकाने का माहौल जरूर बनाया था, मगर भाषा एक बौद्धिक उपक्रम है, इसलिए उन्होंने इसे तत्कालीन कांग्रेसियों की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक रूप में सुलझाया. देखा जाये तो ब्रिटिश सरकार की अपेक्षा गाँधी जी का नजरिया अधिक इकतरफा लगता है. गाँधी ही नहीं, आर्य समाज, धर्म समाज, देवनागरी प्रचारिणी सभा, मेरठ आदि तमाम संस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ताओं  का उद्देश्य भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में रचनात्मक योगदान न देकर संख्या-आधारित जनमत एकत्र करना था. उनके दिमाग में भाषा-नीति का कोई खाका न होकर एक ही बात थी कि अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दुओं की भाषा हिंदी को लाना है जो अपने-आप में अधिक सांप्रदायिक सोच था. उनके पास अपना कोई सोच तो था नहीं, इसलिए गाँधी जी जो निर्णय लेते थे, कार्यकर्ता आँख बंद कर उस पर पिल पड़ते थे. एक बहुभाषी और सांस्कृतिक विविधताओं में फैले इस देश को भाषा के मामले में एक ही लाठी से तो नहीं हांका जा सकता था. शायद यही कारण है कि हिंदी से जुड़ा समूचा भाषा आन्दोलन कुछ हद तक मजहबी आन्दोलन की छवि देने लगा था.


(पांच)
संभव है कि ब्रिटिश शासकों का भी मामले को मजहबी रूप देने में हाथ रहा हो, मगर हंटर कमीशन के अधिकतर सवाल मामले की गहराई में जाकर वास्तविकता जानने के प्रयास लगते हैं. उदाहरण के लिए कमीशन ने भारतेंदु से पूछा था. ‘जो देशी भाषा मान्यता प्राप्त है और स्कूलों में पढ़ाई जाती है, क्या वही लोगों की बोली है? यदि नहीं, तो क्या इस कमी के कारण वह कम उपयोगी और कम जनप्रिय है?’
भारतेंदु जी ने इस सवाल के उत्तर में अपना जो पक्ष रखा है, उसी में आज की उस उहापोह का समाधान भी शामिल है जिसका मैंने इस लेख के आरम्भ में जिक्र किया है. भारतेंदु ने लिखा, “वास्तव में हमारी बोली क्या है, इस प्रश्न का उत्तर देना कुछ कठिन है. भारत में यह कहावत प्रसिद्ध है – बल्कि यह प्रमाणित सत्य है कि प्रत्येक योजन (आठ मील) के बाद बोली बदल जाती है. अकेले उत्तर पश्चिमी प्रान्त में कई बोलियाँ हैं. इस प्रान्त की भाषा एक गहन चीज है, उसके बहुत से रूप हैं. और इसलिए उसे कई उप-शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है; परन्तु इसके मुख्य रूप चार हैं : 1. पूर्वी, जिस रूप में वह बनारस तथा उसके पड़ौस के जिलों में बोली जाती है; 2. कन्नौजी, जो कानपुर तथा उसके आसपास के जिलों में बोली जाती है; 3. ब्रजभाषा, जो आगरा तथा उसकी सीमा के क्षेत्रों में बोली जाती है; 4. कय्यान या खड़ी बोली जिस रूप में वह सहारनपुर, मेरठ तथा उसके इर्द-गिर्द के जिलों में बोली जाती है...

“इन चार रूपों में से केवल दो ऐसे हैं जिनकी और ध्यान आकृष्ट होता है – ब्रजभाषा और खड़ी बोली. ब्रजभाषा का प्रयोग हिंदी की पद्य रचना में किया जाता है, और खड़ी बोली दो विभिन्न रूपों में सारे प्रान्त में बोली जाती है. जब उसमें फारसी शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया जाता है और वह फारसी शब्दों की लिपि में लिखी जाती है, तो वह उर्दू कहलाती है, जब वह बाह्य मिश्रण से अछूती होती है, और नागरी लिपि में लिखी जाती है, तब वह हिंदी कहलाती है; अतः हम इस निष्कर्ष में पहुँचते हैं कि उर्दू-हिंदी में कोई वास्तविक भेद नहीं है...
“अंग्रेजी राज में उर्दू को जो मान प्राप्त है वह इसलिए है कि उर्दू अदालती भाषा है. मुसलमानों की जबान तीक्ष्ण और रसीली तो होती ही है, वे अति उग्र और हठी भी होते हैं. यही कारण है कि वे अन्य लोगों को दबा लेते हैं...

“हमारी सरकार का तर्कसिद्ध और न्यायोचित सिद्धांत यह है कि वह प्रजा के बहुसंख्यक लोगों की इच्छा के अनुसार काम करती है. फिर यह क्यों नहीं देखा जाता कि हिंदी पढ़ने वाली जनता की तुलना में उर्दू पढ़ने वालों का क्या अनुपात है. मैं अनुरोध करके आयोग का ध्यान 1873-74 के आलेख की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ...

“बनारस जिले में जिसका मैं निवासी हूँ, चालू वर्ष में देशी भाषा के स्कूल 103 हैं. इनमें से केवल 8 में उर्दू और हिंदी दोनों पढ़ाई जाती है, शेष में केवल हिंदी की शिक्षा दी जाती है...”

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी भाषा और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए केवल दो लोगों का उल्लेख किया जाता है, प्राथमिक शिक्षा में गाँधी और उच्च शिक्षा में मालवीय जी का. ऐसी छवि प्रस्तुत की गयी है कि इन दोनों ने चंदा करके भारत के हिंदी क्षेत्र में शिक्षा की ज्योति जगाई.  इस सन्दर्भ में भी आयोग द्वारा भारतेंदु से पूछे गए इक्कीसवें प्रश्न का उनके द्वारा दिया गया उत्तर प्रस्तुत कर रहा हूँ.

भारतेंदु ने लिखा, “कुछ अति निम्न जातियों को छोड़कर सभी जातियों के लोग सरकारी कालिजों और सहायता-प्राप्त स्कूलों की सेवाओं का उपभोग करते हैं. मुसलमान इन संस्थाओं का उपभोग कम करते हैं. वे अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध हैं. वे सरकारी स्कूलों में प्राप्य भाषाएँ सीखने के भी विरुद्ध हैं. उनकी धार्मिक प्रवृत्तियां भली भांति विदित हैं, इसका कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है...

मेरे ख्याल में यह बात कि धनी वर्ग के लोग शिक्षा के लिए पर्याप्त धन-सहायता नहीं देते, बिलकुल निराधार है. यदि हम इस प्रान्त के कालिजों और स्कूलों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें पता चलेगा कि इस देश के सभी व्यक्तियों ने किस उदारता से शिक्षा के लिए धन सहायता दी है.कुछ व्यक्ति यह भी कह सकते हैं कि इन धनियों ने केवल आंग्ल-भारतीय अफसरों को खुश करने के अभिप्राय से सहायता दी है, परन्तु इस बात से तो यही सिद्ध होगा कि जनता में दासता की प्रवृत्ति है और यह प्रकट होगा कि बड़े काम सरकारी हस्तक्षेप द्वारा आसानी से पूरे किये जा सकते हैं.’

इसके बाद भारतेंदु ने जन-सहयोग से निर्मित इन शिक्षा-संस्थाओं की सूची प्रस्तुत की है : 1. आगरा कालिज (डेढ़ लाख रूपये की रोकड़ के ब्याज से 1823 में पंडित गंगाधर द्वारा) जिसमें आगरा, अलीगढ़ और मथुरा जिलों के कई गाँवों का लगान जमा होता था, ग्वालियर, भरतपुर के दरबारों से छात्रवृत्तियाँ और बीस हजार की अतिरिक्त छात्रवृत्ति राशि; 2. बनारस कालिज, जिसमें जनता के चंदे से एक लाख तीस हजार से भवन निर्माण के अलावा छोटे-छोटे दान-कोशों से पैतीस हजार पांच सौ रुपये; म्यूर कॉलेज, इलाहाबाद, जिसमें लोगों ने डेढ़ लाख भवन निर्माण के लिए और बासठ हजार छात्रवृत्तियों के लिए एकत्र किया; मुरादाबाद जिला स्कूल, मिर्जापुर जिला स्कूल, बाँदा जिला स्कूल, बदायूं स्कूल, कानपुर का आंग्ल-देशी भाषा स्कूल, इटावा हाई स्कूल के अलावा फर्रूखाबाद, मथुरा, शाहजहाँपुर, एटा, बिजनौर, फतेहपुर, गोरखपुर, हमीरपुर, झाँसी, ललितपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के स्कूलों का भी विवरण दिया है.

भारत के शिक्षा नियोजन के सन्दर्भ में जन-भागीदारी से जुड़े भारतेंदु के इन विचारों को विशेष रूप में ध्यान में रखा जाना चाहिए. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा क्षेत्र में आम आदमी के सरोकारों और उससे जुड़ी भाषा-अभिव्यक्ति की बातें तो खूब की गईं मगर सारा नियोजन औपनिवेशिक मानसिकता के इर्द-गिर्द सिमटा रहकर सामान्य व्यक्ति से लगतार कटता चला गया.
अंत में मैं 1918 में हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर अधिवेशन में हिंदी को लेकर प्रस्तुत किये गए गाँधी जी के विचारों के सापेक्ष उससे 36 वर्ष पूर्व 1882 में हंटर कमीशन को लिखे गए भारतेंदु के विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ. दोनों ने ही अपने दौर में प्रचलित जन-सामान्य की भाषा के दो रूपों – हिंदी और उर्दू – की तुलना करते हुए अपनी जातीय भाषा का पक्ष रखा है. दोनों का आशय एक ही है. मगर गाँधी जी की तुलना में सहज ही मजहब की तौल निर्णायक बन जाती दिखाई देती है जब कि भारतेंदु की तुला में दोनों पल्लों पर हिंदी क्षेत्र का आम-आदमी बैठा हुआ साफ पहचाना जा सकता है... संस्कारों और संस्कृति से भरा-पूरा, मगर अभावग्रस्त एक भारतीय.

अपने भाषण में गाँधी जी कहते हैं:

जो मधुरता मुझे ग्राम की हिंदी में मिलती है वह न तो लखनऊ के मुसलमानों की बोली में है, और न प्रयाग के हिन्दुओं की. भाषा की नदी का उद्गम जनता के हिमालय में है. हिमालय से निकली हुई गंगा हमेशा बहती रहेगी, इसी प्रकार ग्राम की हिंदी हमेशा बहती रहेगी जब कि संस्कृतमय तथा फारसीमय हिंदी छोटी नदी की भांति जो छोटी-सी पहाड़ी से निकलती है, सूख जाएगी और लोप हो जाएगी. हिंदी और उर्दू का सद्संगम उतना ही सुन्दर होगा जितना गंगा और यमुना का, और वह सदैव रहेगा.”

और भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में गाँधी जी के आगमन से ठीक 36 वर्ष पूर्व आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखते हैं:

हिंदी रचना से सम्पूर्ण फारसी शब्दों को निकालने का आग्रह करना भूल है. हम निम्न प्रकार की हिंदी भी नहीं चाहते: “नभोमंडल घनघटाच्छन्न होने लगा. विविध वट बाहुल्य से इस्ततः कुज्झिटिका निपात द्वारा रसातल तपोमय हो गया.” और न निम्न शैली की उर्दू चाहते हैं: “चूँकि दावा-ए-मुद्दई बिल्कुल बईद-अज-अक्ल व गुजिश्ता-अज-हद्दे-समआत व खिलाफ अज-कानून-ए-मुरव्विजा-ए-मुल्क-ए-महरूसा-ए सरकार है.” हम विशुद्ध सरल भाषा चाहते हैं, जिसे जनता समझती है और जो बहुसंख्य लोगों की लिपि में लिखी जाती है. विज्ञान की पुस्तकों में हमें प्राविधिक शब्दों का प्रयोग अवश्य करना पड़ता है क्योंकि उनके लिए हमारी भाषा में समानार्थक शब्द नहीं हैं. परन्तु हम चाहते हैं कि बच्चों की स्कूली पुस्तकों के लिए, अदालती कागजों में, समाचार पत्रों में सार्वजनिक भाषणों में सरल और सामान्य वार्तालाप की भाषा का प्रयोग हो, उसे ही हम सच्चे और सही अर्थों में अपनी मातृभाषा कह सकते हैं.”          

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बटरोही 
जन्म : 25  अप्रैल, 1946  अल्मोड़ा (उत्तराखंड) का एक गाँव

पहली कहानी 1960 के दशक के आखिरी वर्षों में प्रकाशित
हाल में अपने शहर के बहाने एक समूची सभ्यता के उपनिवेश बन जाने की त्रासदी पर केन्द्रित आत्मकथात्मक उपन्यास 'गर्भगृह में नैनीताल' प्रकाशित
अब तक चार कहानी संग्रह, पांच उपन्यास. तीन आलोचना पुस्तकें और कुछ बच्चों के लिए किताबें प्रकाशित.


इन दिनों नैनीताल में रहना. मोबाइल : 9412084322